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कोरोना से तो बचा लिया बाढ़ ने लील लिया जीवन- सरकारें वर्चुअल रैली में व्यस्त

एक तरफ तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के मामले और दूसरी तरफ आसमान से बरसती आफत… कुल मिलाकर उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और कई पूर्वोत्तर राज्य बाढ़ की वजह से कराह रहे हैं. सबसे ज्यादा तबाही बिहार, असम , केरल में हुई. यहां कोरोना संक्रमण के मामले भी उतनी ही तेजी से फैल ,जितनी तेजी से बाढ़ का पानी गांवों में घरों में, बिहार में तो बाढ़ का तांडव लाखों परिवारों को बेघर कर,आपसी सूझ बूझ और समुदायिक पहल पर कई परिवारों की जान बची वहीँ कईयों ने तो अपनी जान भी गंवाई. एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार 4 अगस्त तक बिहार में 19 लोगों की जान जाचुकी है और तक़रीबन 63 लाख से जयादा लोग इस बाढ़ की चपेट में आए हैं , बिहार के 16 से अधिक जिले बाढ़ की चपेट में हैं.

बिहार सरकार दावा कर रही है कि उसने आपदा प्रबंधन विभाग की मदद से रेसक्यू करने वाली टीम को बाढ़ के साथ—साथ कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण के लिए एक म​हीने का विशेष प्रशिक्षण दिया है पर अगर ये सच होता तो कोरोना संक्रमितों के मामले में बिहार मजबूर राज्य नहीं बनता. बहरहाल सरकारी दावे जो भी हों पर मोबाइलवाणी पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोगों ने आप बीती बयां की हैं. आइए जानते हैं बाढ़ में फंसे लोग कैसे भूख, संक्रमण और लाचारी का सामना कर रहे हैं?

गांव से टूट गया है संपर्क

बिहार के समस्तीपुर ज़िले के सैदपुर की मुख्य सड़क से भीतर जाते हैं तो कुछ बगीचे दिखाई देते हैं, जहां सूखी जगह है. मुख्य सड़क के डिवाइड पर भी जो हिस्सा सूखा है, वही बाढ़ प्रभावित लोगों को ठिकाना बना है. यह तस्वीर एकाध जिले की नहीं है बल्कि ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं जहां बाढ़ प्रभावित कैंप के नाम पर सड़क किनारे बैठे हुए हैं. उत्तरी व पूर्वी बिहार में हर वर्ष की तरह इस साल भी बाढ़ एक बड़ी आबादी के लिए परेशानी का सबब बन गई है. बिहार के 38 जिलों में से भागलपुर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, सिवान, बिहारशरीफ व राजधानी पटना में कोरोना कहर बरपा रहा है तो वहीं सुपौल, मधेपुरा, मुंगेर, गोपालगंज, सारण, पश्चिमी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा, खगड़िया, सीतामढ़ी और मुजफ्फरपुर जिलों में नदियां आफत बरसा चुकी हैं. इन इलाकों में बहने वाली कोसी, गंडक और बागमती नदियां ने अपनी सीमाएं तोड़ लोगों के घर-बार को लील लिया. नेपाल के जल अधिग्रहण क्षेत्रों तथा बिहार में हो रही बारिश से भोजपुर से भागलपुर तक गंगा नदी का जलस्तर भी बढ़ता गया.

इस पर से कोरोना से चुनौती को और मुश्किल बना दिया है. सरकार की व्यवस्था को लेकर आंकड़ों का खेल जारी है लेकिन सच तो यही है कि कोरोना व बाढ़ से प्रभावित आबादी एक दूसरी हकीकत का सामना कर रही है. सारण जिले के अमनौर प्रखंड की कई पंचायतों में पानी भरा है पर दिक्कत ये है कि प्रशासन ने वहां नावों की व्यवस्था नहीं की है. वहां पहुंचे मोबाइलवाणी के संवाददाता घनश्याम भगत बताते हैं कि लोगों के घर 4—5 फीट तक पानी भर गया है. कई लोग तो छतों पर बैठे हैं, इस आस में कि कोई आकर उनकी मदद करेगा. घर बुजुर्गों को पानी से बचाने के लिए सरकार ने एंबुलेंस की व्यवस्था भी नहीं की, लोग खाट पर लिटाकर उन्हें अस्पताल पहुंचा रहे हैं. सैकड़ों गांवों का प्रखंड मुख्यालय से सड़क संपर्क टूट गया है. ऐसे में कोई मदद पहुंचे भी तो कैसे?

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट ग्लोबल हेल्थ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार बिहार में संक्रमण फैलने की दर 0.971 हो चुकी है. इसी बीच बाढ़ आ जाने के कारण इस दर में और इजाफा हो गया. सरकार ने टेस्ट किट खरीद कर गांव—गांव पहुंचाने की बात की है पर सवाल ये है कि अगर संक्रमण फैल भी रहा है तो उससे निपटने की तैयारी क्या है? 

पशु या तो मर रहे हैं या बिक रहे हैं

स्टेट हाइवे 74 से उतर कर जैसे ही भवानीपुर ‘गाँव’ की तरफ़ बढ़ते हैं तो गाँव की बजाय सिर्फ़ एक डूब चुके गाँव के अवशेष नज़र आते हैं. बाढ़ के पानी में गांव तो डूबे ही साथ में मवेशी भी मारे गए. हाइवे के दोनों ओर से सड़ांध आ रही है और इसी के डिवाइडर पर लोग पन्नी की छत बनाएं बैठे हैं. हवेली खड़कपुर से लक्ष्मण कुमार सिंह बताते हैं कि बेहरा पंचायत के निचले इलाके में बाढ़ का पानी बढ़ जाने के कारण किसानों को फसलों का नुकसान तो हुआ ही है, साथ पशुओं के चारे की दिक्कत भी होने लगी है. स्थानीय प्रशासन ने आश्वासन दिया था कि पशुओं के चारे और रहने की व्यवस्था भी की जाएगी पर ऐसा हुआ नहीं. अब गांव के किसान आधे दाम पर शहर से आए हुए लोगों को अपने पशु बेच रहे हैं. 

बिहार की हिजरा पंचायत की सी.एच.एफ सदस्य सुनीता देवी कहती हैं कि हमारे घर बाढ़ में डूबे हुए हैं. ना तो पंचायत से कोई मदद मिली ना शहर से कोई अधिकारी आया. कोरोना का डर भी लग रहा है? हमारे पास तो दवाओं तक की व्यवस्था नहीं है. अब सुनीता मोबाइलवाणी पर अपनी बात रिकॉर्ड कर आम लोगों से मदद मांग रही है, कि कोई एक बार उनके गांव आ जाए और यहां फंसे हुए लोगों की मदद कर दे.

अगर हम ये सोचे के प्रशासन ने कुछ मदद पहुंचाई होगी तो ये बात पूरी तरह सच नहीं है. सरकार इन दिनों पानी और कोरोना से ज्यादा चुनाव की तैयारी में व्यस्त है. समस्तीपुर जिले के विभूतिपुर प्रखंड के बोरिया पंचायत के ज्यादातर वार्ड में महादलित परिवार रह रहे हैं. इनके पास पहले ही खाने की किल्लत थी, बाकी कसर लॉकडाउन और बाढ़ ने पूरी कर दी. यहां के परिवार 15 दिनों से पानी में घिरे हुए हैं पर प्रशासन का एक अदद अधिकारी भी इनकी सुध लेने नहीं पहुंचा. गांव के तुलसी राम, गणेश राम, उमेश राम, विन्देश्वरी राम, राम उदगार राम, चन्देश्वर राम भोला राम, शंकर राम, अवधेश राम, सुरेश राम, धर्मदेव राम, रामशीष राम, रामचंद्र राम, अनिल राम, शिव राम, एबं मोतीलाल राम का परिवार सबसे बुरे हाल में है. घर में बच्चे भी हैं, जिनके खाने की व्यवस्था तक नहीं हो पा रही है. महिलाएं बिछवन पर चूल्हा जलाने को मजबूर हैं. जब इन परिवारों से पता करने की कोशिश की क्या जनवितरण प्रणाली की दुकान से राशन मिल रहा है तो कहना था की किसी माह मिल जाता है किसी माह बस मूंह ही देखते रह जाते हैं . 

डूबते—तैरते इन गांवों में अभी भी कोरोना संक्रमण से बचाव के पोस्टर दिखाई देते हैं. पर गांव वालों के सामने सवाल ये है कि वे कोरोना संक्रमण से बचें या फिर बाढ़ से. बिहार के सारण जिले के गारखा प्रखंड से मोबाइलवाणी संवाददाता अजय कुमार ने मनीष कुमार से बात की. मनीष बताते हैं कि उनके गांव में सरकारी कार्यालय से एक भी अधिकारी नहीं पहुंचा. ना कोई सरकारी मदद, राशन या दवाएं आईं. बस कोरोना संक्रमण से बचने की हिदायत पहुंचाई जा रही है. पर सवाल ये है कि बाढ़ में फंसे लोगों के पास ना तो मास्क है, ना साबुन, ना राशन ना दवाएं… ऐसे में वे कैसे बाढ़ और कोरोना दोनों से बचेंगे?

कैम्प में भी बहुत बेहतर नहीं हैं हालात

राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के अपर सचिव रामचंद्र का कहना है, “आठ जिलों के कुल 31 प्रखंडों की 153 पंचायतें बाढ़ से आंशिक रूप से प्रभावित हैं. यहां आवश्यकतानुसार राहत कार्य चलाए जा रहे हैं. इन इलाकों में चल रहे 27 कम्युनिटी किचेन में प्रतिदिन लगभग 21000 लोग भोजन कर रहे हैं.” पर यह काफी नहीं है. कैंप में रहने वालों का कहना है कि यहां सामाजिक दूरी जैसे नियम का पालन तो बिल्कुल नहीं हो रहा. मुंह पर कब तक गमछा लपेटे बैठे रहें. 

सरकार मुआवजे के नाम पर 6 हजार रुपए बांट रही है पर ये पैसा कहां बंट रहा है पता नहीं.  सोनपुर प्रखंड के सबलपुर पश्चिमी पंचायत में महुआ बाग होते हुए बरिया घाट नजरमीरा की ओर तेजी से कटाव बढ़ रहा है. जिसके कारण गांव के लोग डरे हुए हैं. यहां रहने वाले लोग हर साल बाढ़ का रौद्र रूप देखते हैं पर इस बार कोरोना के साथ बाढ़ को झेलना लोगों के लिए मुश्किल हो गया है. गांव के लोग सरकारी मुआवजे और राशन का इंतजार कर रहे हैं.

बिहार के सारण से मोबाइलवाणी संवाददाता संजीत कुमार ने सोनपुर प्रखंड के दुधाइला पंचायत के मखदूमपुर गांव के शैलेश कुमार से बात की. शैलेश बताते हैं कि बाढ़ के कारण सबसे ज्यादा दिक्कत साफ पानी की है. हमारे प्रखंड में 2 हजार एकड़ खेत पानी में डूबे हुए हैं. करीब 5 हजार किसान परिवार हैं जो अपने घर छोड़कर हाइवे पर रह रहे हैं. सोनपुर प्रखंड के ही किसान पंकज सिंह परमार बताते हैं कि खेत और घरों में पानी भरा हुआ है. सरकार कहती है कि स्थानीय प्रशासन मदद करेगा पर यहां मदद के लिए कोई नहीं आता. हर साल यही होता है, हम लोग अपनी समस्या से खुद ही जूझते हैं. नेता लोग तो बस वोट मांगने आते हैं. लॉकडाउन के कारण किसान पहले ही बहुत नुकसान झेल रहे थे पर बाढ़ के कारण तो और भी हालात खराब हो गए हैं.

भवानीपुर से सटे चंपारण तटबंध पर आज भी लोग अनाज, सुरक्षित निवास से लेकर बाढ़ में हुई क्षति के मुआवज़े तक के लिए तरस रहे हैं. इन 370 गांवों में रहने वाली तक़रीबन दस लाख की जनसंख्या बाढ़ प्रभावित बताई जा रही है. जो सरकारी दावों से कहीं ज्यादा है. मुआवजा पाने के लिए बैंक वेरिफ़िकेशन में ही दस दिन से ऊपर समय लग जाता है. साथ ही सरकारी नियमों और क़ायदों के लिए पूरे दस्तावेज चाहिए, अब जिनके दस्तावेज घर के साथ पानी में डूब गए हैं उनके सामने यह और भी विकराल समस्या है. जो लोग कैंप में रह रहे हैं उन्हें खाने के नाम पर दो किलो चूड़ा दिया गया. कुछ जगहों से एक समय खाना दिए जाने की खबरें भी आ रही हैं. 

फंसे हुए लोगों से बात करो तो वो कहते हैं कि पहले बाढ़ से बचने की सोचें या कोरोना से. कोविड तो थोड़ा समय भी दे देगा लेकिन बाढ़ का पानी तो इंस्टेंट फैसला कर देता है. इसलिए सब भूल हमलोग बाढ़ से बचाव में जुटे हैं.

आफत की बारिश केवल बिहार में नहीं बरसी

पानी, राशन, कोरोना और मुआवजे के बीच बच्चों की अपनी ही समस्या है. समस्तीपुर में कक्षा आठ में पढ़नें वाले विशाल कुमार ने मोबाइलवाणी पर अपनी बात रिकॉर्ड की. विशाल कहते हैं कि कोरोना के बाद लॉकडाउन हुआ तो कोचिंग और स्कूल बंद हो गए. फिर स्कूल वालों ने बोला कि फोन पर पढ़ाएंगे पर हमारे पास तो फोन भी नहीं है. इसके बाद बाढ़ आ गई, तो उसके कारण अब तो कुछ किताबों से पढ़ पा रहे थे वो भी बंद हो गया है. जाहिर सी बात है कि ये साल गरीब बच्चों के लिए बहुत मुश्किल भरा रहा है.

ऐसा नहीं है कि आफत की बारिश केवल बिहार में बरसी. बल्कि मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिला से योगेश गौतम बताते हैं कि जिले में लगातार बारिश के कारण कई रहायशी इलाकों में पानी जमा है. गांवों की स्थिति तो और भी बदत्तर है. खास बात ये है कि प्रदेश में सर्वाधिक मक्का उत्पादन इसी क्षेत्र से होता है और बारिश ने इस साल की फसल को चौपट कर दिया है. साथ ही सोयाबीन के किसान भी बारिश में अपनी फसल खो चुके हैं. सरकार आश्वासन दे रही है पर ये तो उन्हें हर साल मिलता है. मुआवजे के नाम पर किसानों के खाते में 5—6 हजार रुपए से ज्यादा नहीं आते. किसानों का कहना है कि अब इतने से रुपयों से परिवार का गुजारा कैसे करेंगे? ओडिशा से शीतल ने मोबाइलवाणी पर रिकॉर्ड कर बताया कि उनके घर में बारिश का पानी जमा है. और कोई भी सफाई कर्मचारी मदद के लिए नहीं आया. अब इस पानी में बदबू आने लगी है और मच्छर हो रहे हैं. घर में बच्चे भी हैं,मलेरिया की पूरी संभावनाएं बनती जारही है . 

छात्र भी हैं परेशान

इसी बीच छात्रों की समस्याएँ भी समझने का प्रयास किया तो समस्तीपुर से दर्जनों छात्रों ने कहा महीनों से घर में बाढ़ का पानी भरा है , बिजली काट दी गयी है और हम सब परिवार के साथ बांध पर जीवन यापन कर करे हैं ऐसे में हमें परीक्षा भी देने हैं नीट के परीक्षा 13 सितम्बर से है और JEE की परीक्षा होगई , सरकार केवल शहरों में रह रहे छात्रों को इस परीक्षा में शामिल करने का मन बना चुकी है , हम किसी भी तरह शामिल हो भी जाएँ तो इतने दिनों पढाई तो की नहीं , घर वाले की परेशानी देख कर परीक्षा देने चले भी जाएँ तो परीक्षा परीणाम बेहतर नहीं आएगा , यह सभी छात्र समस्तीपुर के वारिश नगर, विभूतिपुर कई अन्य प्रखंड से ताल्लुक रखते हैं जो बाढ़ से बहूत ज्यादा प्रभावित हुए हैं .

इसी बीच एक खबर  अच्छी  ये आरही है की महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री उदय सामंत ने केंद्र से महाराष्ट्र के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के छात्रों के लिए दोबारा परीक्षा लेने की गुहार लगायी है , इस पर निर्णय अभी विचाराधीन है और केंद्र सरकार की शिक्षा विभाग जल्द ही कुछ फैस ले सकती है लेकिन अभी देखना होगा की यह निर्णय केवल महाराष्ट्र के लिए होगा या सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए. 

इस बीच कुछ जगहों से अच्छी खबरें भी आईं. लोगों के ने मोबाइलवाणी को कई तरह से धन्यवाद भी दिया. क्योंकि जहां इंटरनेट और बाकी तकनीकी सुविधाएं बंद हो गईं थीं, वहां मोबाइलवाणी की आईवीआर सर्विस ने लोगों का साथ नहीं छोड़ा. बिहार राज्य के जिला सारण से प्रेमजीत कुमार मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि परसा प्रखंड अंतर्गत बनकेरवा माड़र कांटा सड़क पानी के तेज बहाव में टूट गई थी. लोग शहर तक नहीं जा पा रहे थे. हाथ की बनी नाव से मुख्य मार्ग तक पहुंचते थे और फिर जरूरत का सामान लाते थे. पर जब इस खबर को रिकॉर्ड कर अधिकारियों तक पहुंचाया तो तत्काल एक टीम वहां पहुंची और रास्ते की मरम्मत कर दी. 

यानि उम्मीद अभी बाकी है पर ये आपके हमारे भीतर ही है. क्योंकि सरकारें तो इन दिनों वर्चुअल रैली में व्यस्त हैं और आला अफसर चुनाव की तैयारी में.